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Monday, 9 December 2013

सतत एवम व्यापक मूल्यांकन- एक कविता

जो दौड़ लगाकर बैठ गये, वो राहों में रह जाते हैं,
जो चलते रहते सतत यहाँ, निश्चय ही मंजिल पाते हैं।
बच्चों की बहुमुखी प्रतिभा का, बेहतर मापक होता है,
वहीं दूसरो शब्दों में, मूल्यांकन व्यापक होता है।

बच्चों ने कितना सीखा, ये संकेतक बतलाते हैं,
पाठयक्रमीय लक्ष्यों को हासिल, करने के ये नाते हैं।
अब तक मैंने इनता सीखा, जाना या फिर पहचाना,
इसकी सम्यक समझ न जिनको, राहों में रह जाते है।

बहुत जरूरी हम शिक्षक हित, संकेतक का ज्ञान है,
अब प्रकरण पर नहीं, प्रक्रिया पर ही देना ध्यान है।
कितनी हुई प्रगति अब तक, होती इससे पहचान है,
मेरा तो मन्तव्य यहीं, ये सी0सी0ई0 की जान है।

बच्चों की गतिविधियों का जब बेहतर अवलोकन होगा,
तभी आंकलन बिन्दु मिलेंगे, और उनका अंकन होगा।
शिक्षक की डायरी हो या फिर छात्रों की हो प्रोफाइल,
समझ प्रपत्रों पर बनते ही, सम्यक अभिलेखन होगा।

हर बच्चा विशिष्ट है खुद में, इसको हमे समझाना होगा,
है उसकी क्या खास जरूरत, इस पर चिंतन करना होगा।
समय कहे कार्यान्वित हो, व्यक्तिगत योजना शिक्षा की,
मूल्यांकन विधियाँ हों विशिष्ट, ना डर हो कभी परीक्षा की।

हो अगर सफलता की चाहत, मन बचन कर्म से एक बनें,
सी0सी0ई0 सेल कुछ कार्य करें ऐसा, कि हम सब नेक बनें।
जो कर्मठ और उत्साही हों, पा सकें समर्थन नियमित गर,
तो गारण्टी इस बात की है, मंजिल की राह अनेक बने।

राह-ए-मंजिल इफ व बट होता नहीं भाई,
कोई भी कार्य फटाफट, होता नहीं भाई।
खोएं न धैर्य कभी भी, चलते रहें सतत
सफलता का कोई शार्ट कट, होता नहीं भाई।

जिन्दगी भोर है, सूरज सा निकलते रहिए,
नित नवाचार से, खुद को भी बदलते रहिए।
अगर रूक जायेंगे, मंजिल न पा सकेंगे कभी,
धीरे-धीरे ही मगर, अनवरत चलते रहिए।

Composed by : विन्ध्येश्वरी प्रसाद बिन्ध्य
ए0बी0आर0सी0 पिण्डरा
वाराणसी।
Shard by : मनीष कुमार सिंह, स0अ0
प्रा0वि0- चितर्इपुर, पिण्डरा
वाराणसी।

Tuesday, 3 December 2013

एक अनुभव - सी.सी.र्इ. क्यों करें?

मुझे अपने जनपद वाराणसी में सी. सी. र्इ. प्रशिक्षण के अनुश्रवण का अवसर प्राप्त हुआ। प्रारम्भ में एक विकास क्षेत्र में गया तो वहा मास्टर ट्रेनर महोदय सें एक प्रतिभागी शिक्षक पूछ रहे थे कि आखिर हम सी.सी. र्इ. क्यों करें, खासकर रिकार्डिंग क्यों करें जब हमें अपने प्रत्येक बच्चे के बारे में पता होता ही है। ट्रेनर महोदय अपने तर्को द्वारा समझाने का प्रयास कर रहे थे, परन्तु  प्रतिभागी शिक्षक संतुष्ट नहीं थे। वे लगातार प्रश्न कर रहे थे, मानो वे तय करके आये थे कि आज तो प्रश्नों की बौछार करनी हो। कुछ समय पश्चात मैं भी प्रतिभागियों को समझाने का प्रयास किया वे शान्त तो हो गये, परन्तु उनका हाव-भाव कह रहा था कि वे  यह मानने के लिये तैयार नहीं थे कि बच्चों के साथ-साथ वास्तव में उनकी शिक्षण प्रक्रिया का भी मूल्यांकन होता है।

मैं इस घटना की चर्चा इसलिये कर रहा हू कि पाच-छ़: दिनों बाद हम लोग अनुश्रवण करने के लियें एक अन्य विकास क्षेत्र में गये साथ में एस. एस.ए. लखनऊ से सलाहकार महेन्द्र जी भी थे। उस विकास क्षेत्र में भी एक शिक्षक ने चर्चा के उपरांत यही प्रश्न किया कि हम सी.सी.र्इ. क्यों करें ? यहां भी आशय मुख्य रूप से रिकार्डिंग करने के संबंध में ही था। महेन्द्र जी ने इस प्रश्न का उत्तर स्वयं न देकर प्रतिभागियों से ही पूछा कि आप में से कोर्इ बतायें क्यों करें ?

प्रतिभागियों में से ही एक मैडम जी ने इसका उत्तर देते हुए कहा था कि सर जब हम अपनी योजना या फिर बच्चों की प्रगति लिखते हैं तो हमें गंभीरता के साथ सोचना पड़ता है। इससे हमारी प्लानिंग और बढि़या होती है। उसी प्रकार कक्षा की समापित के बाद पुन जब हमें अपनी टिप्पणी दर्ज करनी होती है तो हम एक बार फिर से सोचने के लिए बाध्य हो जाते हैं। अगर हम न लिखें तो निशिचत रूप से हम इस प्रकार से सोचकर काम नहीं करते हैं। इस प्रकार रिकार्डिंग करने से शिक्षक अपने काम को गंभीरता से और बेहतर ढंग से करने लगता है। एक बात और लिखने से यह अभिलेख के रूप में हमारे पास होता है जिसका उपयोग हम भविष्य में कर सकते हैं अन्यथा न लिखने की दशा में हम तो भूल जाएंगे।

प्रतिभागी के इस उत्तर ने हम लोगों को तो काफी प्रभावित किया ही, प्रश्न कर रहे प्रतिभागियों को भी संतुष्ट किया। इस प्रश्न का उत्तर महेन्द्र जी या फिर हम दे सकते थे, परन्तु उन्होंने इसका उत्तर प्रतिभागियों से ही पूछा, और जैसे ही उस मैडम ने सकारात्मक उत्तर दिया वैसे ही प्रश्न पूछने वाले अघ्यापक महोदय तथा उनके कुछ साथी ,जो केवल प्रश्न पूछना अपना एकाधिकार समझते है, बगले झांकने लगें।

वास्तव में बहुत से अध्यापक-अध्यापिका हैं, जो बच्चों के साथ,बच्चों के अनुसार कार्य करने तथा उस कार्य का आत्म- मूल्यांकन करनें की सकारात्मक सोच रखते हैं। यदि हम सभी अध्यापक इस तरह का सकारात्मक सोंच रखें तब शायद यह प्रश्न ही नही आयेंगा कि हम सी.सी.र्इ.क्यों करें । एक और बात जो मैं यहां कहना चाहूंगा कि अच्छे शिक्षकों को सी.सी.ई. करना नहीं पड़ता है, उनसे यह हो ही जाता है क्योंकि उन्हें यह पता है कि इसके बिना सार्थक शिक्षण हो ही नहीं सकता। यह उनकी शिक्षण पद्धति का अभिन्न हिस्सा है। और यह देखकर अच्छा लगता है कि ऐसे शिक्षक इस बात से सहमत होते हैं कि रिकार्डिंग करने से उनकी इस प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
                                                          
            - डा0 कुवर भगत सिंह, वाराणसी
(drkunwarbsingh@gmail.com)

Monday, 2 December 2013

मूल्यांकन / आकलन / मापन / परीक्षण में अन्तर


सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की संकल्पना के पूर्व शैक्षिक संन्दर्भ में मूल्यांकन के अर्थ पर विचार कर लेना समीचीन होगा। मूल्यांकन के स्वरूप को स्पष्ट रूप में समझने के लिए मापन से उसका अर्थ भेद समझ लेना आवश्यक है।
           
अन्तर के बिन्दु
आकलन (Assessment)
मूल्यांकन (Evaluation)
मापन (Measurement)
परीक्षा / परीक्षण (Examination/ Test)
अर्थ

आकलन एक संवादात्मक तथा रचनात्मक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा शिक्षक को यह ज्ञात होता है कि विधार्थी का उचित अधिगम हो रहा है अथवा नहीं।
मूल्यांकन एक योगात्मक प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी पूर्व निर्मित शैक्षिक कार्यक्रम अथवा पाठयक्रम की समाप्ति पर छात्रों की शैक्षिक उपलबिध ज्ञात की जाती है।
मापन आकलन मूल्यांकन की एक तकनीक है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति या पदार्थ में निहित विशेषताओं का आंकिक वर्णन किया जाता है।
परीक्षा तथा परीक्षण आकलन/मूल्यांकन का एक उपकरण/पद्धति है जिसके द्वारा परीक्षा/परीक्षण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मुख्य रूप से पाठयक्रम के ज्ञानात्मक अनुभव कौशल की जांच की जाती है।
उददेश्य

इसका उददेश्य निदानात्मक होता  है। शैक्षिक संदर्भ में आकलन का उददेश्य शिक्षण- अधिगम कार्यक्रम में सुधार करना, छात्रों व अध्यापक को पृष्ठपोषण प्रदान करना तथा छात्रों की अधिगम संबंधी कठिनाइयों को ज्ञात करना होता है।
इसका उददेश्य मूल्य निर्णयन करना होता है। शैक्षिक संदर्भ में मूल्यांकन का उददेश्य निर्धारित पाठयक्रम की समाप्ति पर छात्रों की उपलब्धि को ग्रेड अथवा अंक के माध्यम से प्रदर्शित करना है।
मापन आकलन तथा मूल्यांकन की एक तकनीक है।
परीक्षा द्वारा मुख्य रूप से पाठयक्रम के ज्ञानात्मक अनुभव कौशल की जांच की जाती है। परीक्षा तथा परीक्षण मूल्यांकन का एक उपकरण/पद्धति है। छात्र के ज्ञान, क्षमता, कौशल, रूचि आदि की जांच की जाती है।
अवधि

यह सम्पूर्ण अकादमिक अवधि के दौरान निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।
यह पाठयक्रम की समाप्ति पर होने वाली प्रक्रिया है।
यह कभी भी या कभी-कभी चलने वाली प्रणाली है।
यह एक निश्चित समय के अन्तराल पर अपनाया जाने वाला उपकरण है जैसे कि मासिक, अर्धवार्षिक एवं वार्षिक आदि।
शिक्षण-शास्त्रीय

शिक्षण शास्त्र का हिस्सा है, जो पढ़ने-पढाने के साथ-साथ चलता है।
शिक्षण शास्त्र का हिस्सा है, जो पढ़ने-पढाने के अंत में  उपलब्धियों के वर्गीकरण के लिए किया जाता रहा है।
मापन मुख्य तौर पर व्यकितत्व के विभिन्न पहलुओं जैसे- मानसिक क्षमता, रूझान इत्यादि के लिए किया जाता रहा है।
पारंपरिक रूप से यह शिक्षण शास्त्र में स्मृति आधारित ज्ञान के लिए होता है तथा शिक्षणेत्तर गतिवधियों के लिए भी होता है।

Thursday, 28 November 2013

CCE की ट्रेनिंग में प्रतिभाग

जनपद रायबरेली में CCE की ट्रेनिंग के सिलसिले में मेरी विजिट का आज तीसरा दिन था. इसके पहले मैं वाराणसी में भी CCE की ट्रेनिंग देख चुका हूँ. एक कॉमन ऑब्जरवेशन मेरा यह रहा है कि पुरुष शिक्षकों की तुलना में महिला शिक्षकों की रूचि और भागीदारी कहीं ज्यादा दिख रही है. चाहे ट्रेनिंग के दौरान बड़े समूह में चर्चा हो रही हो या फिर छोटे समूह में, किसी गतिविधि में प्रतिभाग का सवाल हो, या फिर किसी प्रश्न का उत्तर देना हो. इन सबमें महिला शिक्षक बढ़-चढ़ कर प्रतिभाग कर रही हैं. वहीँ सक्रिय प्रतिभाग करने वाले पुरुष शिक्षकों की संख्या कम है.


आखिर ऐसा क्यों है?

Friday, 22 November 2013

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन क्यों?

हम सतत एवं व्यापक मूल्यांकन क्यों करें? क्या बिना रिकार्डिंग के सतत एवं व्यापक मूल्यांकन नहीं हो सकता है?

यह यक्ष प्रश्न मेरे सामने उस वक्त आया जब मैं बाबा भोले की नगरी काशी में सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के अंतर्गत शिक्षक प्रशिक्षण के अवलोकन एवं अनुसमर्थन प्रदान करने के सिलसिले में एक विकास खंड में शिक्षकों से रूबरू हो रहा था।

प्रशिक्षण शुरू हुये तीन दिन बीत चुके थे और यह चौथा दिन था। पूर्व की भांति ही मैं शिक्षकों से यह समझने का प्रयास कर रहा था कि गत दो दिवसों में क्या कुछ हो चुका है। इसी बातचीत के क्रम में मैं यह आकलन कर रहा था कि उक्त प्रशिक्षण के महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर प्रतिभागी शिक्षकों की समझ कितनी बनी है, और मुझे किन बिन्दुओं पर बात को आगे बढ़ानी चाहिये।

उक्त शिक्षक महोदय बिना कुछ प्रतिक्रिया दिये हमारी वार्ता सुन रहे थे। वार्ता के क्रम में अन्य शिक्षक साथियों जिनमें शिक्षिकाओं की संख्या अधिक थी, ने कर्इ प्रश्न किये जिनका मैंने अपनी समझ से उत्तर देने की कोशिश की। मुख्यत: संकेतक और रिकार्डिंग पर ही अधिक प्रश्न थे।

जब वार्ता अपनी आखिरी पड़ाव की ओर थी और मैं मानसिक रूप से अगले विकास खंड की तरफ बढ़ने को अपने को कह रहा था, उसी समय वे शिक्षक महोदय उठे और अपनी अंदर चल रहे झंझावातों से मुझे झकझोरने के अंदाज में बोले - "यह बताइए कि आखिर हम सतत एवं व्यापक मूल्यांकन क्यों करें? क्या पहले हम बच्चों का मूल्यांकन नहीं करते थे? क्या पहले बच्चे नहीं सीखते थे? फिर हमारे ऊपर इतना बोझ क्यों थोपा जा रहा है?"

अपनी बात कहने के बाद कक्ष में चारों ओर निगाह दौड़ाकर अन्य शिक्षकों पर इसका प्रभाव देखने की कोशिश करते हुए मानो वे यह कहना चाह रहे हों कि देखा आपने, मुख्य प्रश्न तो मैंने पूछा है। आप लोग तो अभी तक बस इधर-उधर की ही बातें कर रहे थे।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन से मास्टर साब को आशय रिकार्डिंग से था। अभी भी हमारे कर्इ शिक्षक साथी रिकार्डिंग को ही सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का पर्याय समझते हैं। यह धारणा हमारे सामने बहुत बड़ी चुनौती है। 

ख़ैर, मास्टर साब के प्रश्न पूछने के बाद भी मैं अपनी स्वाभाविक मुस्कान बनाए रखने की कोशिश में सफल रहा, हालांकि अंदर कुछ उफान सा उठता हुआ मैंने महसूस किया। मैंने मास्टर साब से कहा - "सर, आज ट्रेनिंग का तीसरा दिन है, और मेरे ख्याल से पहले दिन ही इस प्रश्न पर चर्चा हुर्इ होगी।"

"नहीं सर, आप बताइए। हम अभी तक इसे समझ नहीं पाये हैं।" मास्टर साब ने प्रतिरोध के स्वर में अपनी बात को पुन: लगभग दुहरा सा दिया।

मैंने इस प्रश्न को सदन में सभी के सामने रखते हुये कहा - "क्या आप में से कोर्इ शिक्षक साथी मास्टर साब की इस शंका का समाधान करना चाहेंगे?"

पहले तो प्रतिक्रिया शून्य रही। मैं इस प्रश्न का उत्तर शिक्षक साथियों से ही चाह रहा था। अत: मैंने अपनी बात को पुन: दूसरे शब्दों में रखा - "अभी जब आपसे बात हो रही थी, तब आपने इस प्रश्न का उत्तर दिया था। बहुत ही अच्छे तरीके से आपने सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का क्या अर्थ है, इसका महत्त्व क्या है और रिकार्डिंग करने के क्या फायदे हैं, इस पर अपनी बातों को रखा था। बताइए!"

एक मैडम जी उठीं। मुझे ऐसा लगा कि उन्हें इस सिस्टम में आये दो-तीन वर्षों से ज्यादा नहीं हुआ होगा। बड़े ही सरल शब्दों में उन्होंने कहा - "सर, वैसे तो यह ठीक है कि बच्चों को पढ़ाने के लिए हमारे मन में कुछ प्लानिंग होती है, लेकिन जब हम इसे लिखते हैं, तो हमें गंभीरता के साथ सोचना पड़ता है। इससे हमारी प्लानिंग और बढि़या होती है। उसी प्रकार कक्षा की समापित के बाद पुन: जब हमें अपनी टिप्पणी दर्ज करनी होती है, तो हम एक बार फिर से सोचने के लिए बाध्य हो जाते हैं। अगर हम न लिखें, तो निशिचत रूप से हम इस प्रकार से सोचकर काम नहीं करते हैं। इस प्रकार रिकार्डिंग करने से शिक्षक अपने काम को गंभीरता से और बेहतर ढंग से करने लगता है। एक बात और, लिखने से यह अभिलेख के रूप में हमारे पास होता है जिसका उपयोग हम भविष्य में कर सकते हैं, अन्यथा न लिखने की दशा में हम तो भूल जाएंगे।"

इस प्रकार बहुत ही सटीक भाषा में सतत एवं व्यापक मूल्यांकन एवं रिकार्डिंग के महत्त्व और उपयोगिता को पूरे सदन के सामने रखने के लिए मैंने मैडम को ह्रदय से धन्यवाद दिया। कुछ ओर शिक्षकों ने भी मैडम की बात का समर्थन किया।

मैंने फिर मास्टर साब से पूछा - "सर, क्या अब भी मेरी तरफ से कुछ कहने की आवश्यकता है?"

मास्टर साब शांत थे।

इस चर्चा को समाप्त करते हुए मैंने बस इतना और जोड़ा - "हमें इस बात पर ग़ौर करने की ज़रूरत है कि आखिर हमें अपना काम ही बोझ क्यों लगने लगता है? हम सभी अपने विधालय के बच्चों को एक बेहतर भविष्य देना चाहते हैं, और उसी लक्ष्य को लेकर हम सभी अपने तरीके से बच्चों को सीखने में मदद करते हैं। सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की यह पूरी प्रक्रिया हमें अपने ही काम को और बेहतर ढंग से करने में हमारी मदद करती है। जिस दिन हम इस रूप में इसे समझेंगे, यह हमें बोझ नहीं लगेगी। यह हमारी शिक्षण प्रक्रिया का एक अंतरंग, अभिन्न एवं अक्षुण्ण हिस्सा बन जाएगी।"

आपके क्या विचार हैं? ज़रूर लिखयेगा!
- महेंद्र

Monday, 18 November 2013

संकेतक की कविता

बच्चों ने कितना सीखा, ये संकेतक बतलाते हैं,
पाठयक्रमीय लक्ष्यों को हासिल करने के नाते हैं।
अब तक मैंने इतना सीखा, जाना या फिर पहचाना,
इसकी सम्यक समझ न जिनकों, राहों में रह जाते हैं।।

बहुत जरूरी हम शिक्षक हित संकेतक का ज्ञान है,
अब प्रकरण पर नहीं प्रकि्रया पर ही देना ध्यान है।
कितनी हुयी प्रगति अब तक होती इससे पहचान है,
मेरा तो मन्तव्य यही, ये CCE की जान है।।

Composed by - बिन्देश्वरी प्रसाद,
0बी0आर0सी0-पिण्डरा,
वाराणसी।

Shared by - महमूदुल हक
00, पू0मा0वि0-मुजेहनी,
बलरामपुर।

बच्चों की प्रगति के संकेतक

यह हमारी एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि किसी भी नए प्रत्यय या शब्दावली की हम परिभाषा ढूंढ़ने की कोशिश करने लगते हैं। कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनकी कोर्इ निर्धारित परिभाषा नहीं होती है। वे अपने गुणों व विशेषताओं से पहचाने जाते हैं। जैसे, शिक्षा की परिभाषा क्या होगी? या फिर सत्य को आप कैसे परिभाषित करेंगे? ऐसे शब्दों की कोर्इ निशिचत परिभाषा नहीं होती है। इनके गुणों की वजह से ही इनकी पहचान होती है। साथ ही ये तुलनात्मक होते हैं। शिक्षा या सत्य की परिभाषा व्यक्ति विशेष पर निर्भर होती है तथा यह उनके लिए अलग-अलग हो सकती है।

संकेतक एक ऐसा ही शब्द है। आइए, हम इसकी बुनियादी समझ बनाने की कोशिश करते हैं। अब तक हम दक्षता के आधार पर बच्चों के अधिगम स्तर का निर्धारण करते रहे हैं जिसे Minimum Level of Learning कहते हैं। ये दक्षताएं एक पाठयक्रम के माध्यम से प्रदेश के समस्त विधालयों में लागू होती हैं। इस प्रकार एक समान दक्षताओं के आधार पर ही समस्त विधालयों में शिक्षक अपनी शिक्षण योजना बनाते हैं। प्रश्न यह है कि क्या यह उचित है? क्या प्रदेश के समस्त विधालयों में बच्चों के सम्प्रापित आकलन के लिए एक जैसा मानदण्ड निर्धारित करना चाहिए? या फिर इसे तय करने की जि़म्मेदारी व स्वतंत्रता विधालय व शिक्षक के ऊपर छोड़ देना चाहिए?

तमाम प्रयोगों व अध्ययन के आधार पर प्राप्त निष्कर्ष यह बताते हैं कि इस प्रकार के मानदण्ड या संकेतक का निर्माण करने की स्वतंत्रता विधालय व उसके शिक्षक के पास होनी चाहिए। शिक्षक ही वह व्यकित होता है जो अपनी विधालय व कक्षा के बच्चों की आवश्यकता व संप्रापित से बेहतर ढंग से अवगत होता है। संकेतक बच्चों की इसी प्रगति का आकलन करने में मदद करता है और शिक्षक ही इसे बेहतर ढंग से बना सकता है। अत: यह लचीली होती है। हो सकता है कि शिक्षक दो-तीन संकेतकों को मिलाकर एक संकेतक बना ले, या फिर एक संकेतक को दो या अधिक संकेतकों में विभाजित कर अपनी शिक्षण कार्ययोजना बना सकता है।

संकेतक हमें बच्चों के प्रगति के मानदण्ड प्रदान करते हैं। संकेतक हमें यह बताते हैं कि बच्चे ने अभी तक कितना ज्ञान व कौशल अर्जित किया है। साथ ही संकेतक हमें यह भी बताते हैं कि बच्चे की प्रगति की दिशा क्या है। साथ ही ये आकलन के प्रति शिक्षक व विधालय का नज़रिया प्रस्तुत करते हैं। यह नज़रिया स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार अपने मानदण्डों के निर्धारण को दर्शाता है।

पूर्व में शिक्षक का ज़ोर बच्चों के उत्तर पर रहता था, और इस क्रम में प्रक्रिया गौण हो जाती थी। यह दृषिटकोण सही नहीं था। संकेतक हमें प्रक्रिया की ओर ले जाता है। संकेतक इस बात पर ज़ोर देता है कि बच्चे ने उत्तर किस प्रकार प्राप्त किया है। प्रक्रिया बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और संकेतक इसी ओर इंगित करता है। उदाहरण के लिए, शिक्षक ने कक्षा में हासिल का जोड़ कैसे किया जाता है, इस विषय पर शिक्षण किया। यह जांचने के लिए कि बच्चों ने यह सीखा कि नहीं, उसने एक प्रश्न (17+25) बोर्ड पर लिखा। कुछ बच्चों ने इसका उत्तर 312 लिखा। शिक्षक ने गलत उत्तर देखकर उस उत्तर को लाल रंग से काट दिया। क्या यह सही है? अगर हम बच्चे के उत्तर का विश्लेषण करें तो यह पता चलता है कि बच्चे ने एक अंक का जोड़ सही किया है। इस आधार पर उसकी वर्तमान संप्राप्ति स्तर का पता चलता है कि वह एक अंक का जोड़ कर रहा है।

संकेतक बच्चों की प्रगति का आकलन करने में मदद करती है. शिक्षक को सतत और व्यापक मूल्याङ्कन की अपनी आँख खुली रखनी चाहिए ताकि संकेतक का वह लगातार इस्तेमाल करते हुए शिक्षण अधिगम प्रक्रिया की प्रभाविता का लगातार मूल्याङ्कन करता रहे और उसमें आवश्यकता अनुसार परिवर्धन करता रहे. संकेतक इसे प्रभावी तरीके से अमल में लाने में शिक्षक की मदद करता है.



संकेतक पाठयक्रमीय लक्ष्यों पर आधारित होते हैं।

Sunday, 3 November 2013

आकलन की समझ व पारम्परिक मूल्यांकन की प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता

वर्तमान समय में प्रदेश के विधालयों में पारम्परिक मूल्यांकन की जो प्रणाली लागू है, उसके अन्तर्गत वार्षिक और अद्र्धवार्षिक परीक्षा के अतिरिक्त सत्र के मध्य में भी ली जाने वाली दो परीक्षाओं- कुल मिलाकर चार लिखित परीक्षाओं के माध्यम से मूल्यांकन का प्रावधान है। वर्तमान मूल्यांकन प्रकि्रया पूरी तरह से औपचारिक ताने-बाने में गुँथी हुअी है। निशिचत अवधि के अंतराल पर मौखिकलिखित परीक्षा के दिन तय किये जाते हैं।

आर.टी.र्इ.-2009 और एन.सी.एफ.-2005 में यह बार-बार कहा गया है कि बच्चे के अनुभव को महत्व मिलना चाहिए एवं उसकी गरिमा सुनिशिचत की जानी चाहिए, परन्तु यह तब तक पूर्णतया संभव नहीं है जब तक कि प्रचलित मूल्यांकन पद्धति में परिवर्तन न किया जाय। वर्तमान मूल्यांकन व्यवस्था में किसी समय विशेष पर लिखित परीक्षा की व्यवस्था है, जबकि छात्र का संवृद्धि एवं विकास सम्पूर्ण सत्र में विकसित होता है। इस तरह के मूल्यांकन से कुछ बच्चों को असुरक्षा, तनाव, चिंता और अपमान जैसी सिथतियों का सामना करना पड़ता है। सावधिक परीक्षाओं से यह तो पता चलता है कि बच्चे कितना जानते हैं, पर यह नहीं पता चलता कि जो नहीं जानते उनके न जानने के क्या कारण हैं। इस तरह का मूल्यांकन पाठय पुस्तकों में पढ़ार्इ गर्इ विषयवस्तु और रटंत प्रणाली द्वारा प्राप्त की गर्इ जानकारीज्ञान का मूल्यांकन करने तक ही सीमित है। 

अधिकांशत: यह बच्चों में तुलना करने जैसे भाव रखता है और अवांछनीय प्रतिस्पर्धा को जन्म देता है। वर्तमान व्यवस्था में केवल बच्चे की अकादमिक प्रगति का मूल्यांकन होता है, जबकि बच्चे के सर्वांगीण विकास में अकादमिक प्रगति के साथ-साथ उसकी अभिवृतितयों, अभिरुचियों, जीवन-कौशलों, मूल्यों तथा मनोवृतितयों में होने वाले परिवर्तनों का भी समान महत्व होता है।

इस प्रकार की सिथतियां कुछ महत्वपूर्ण सवालों की तरफ हमारा ध्यान खींचती हैं जैसे- हम किस चीज का मूल्यांकन कर रहे हैं? क्या टेस्टपरीक्षाओं के अतिरिक्त बच्चों का मूल्यांकन करने की कुछ और विधियाँ भी हो सकती हैं? क्या अंकों और ग्रेड के रूप में रिपोर्ट करना पर्याप्त है? मूल्यांकन संबंधी सूचनाएं किस तरह मदद करती हैं? हम अपने काम को कठिन बनाए बिना भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि से आये, और विशेष आवश्यकताओंं वाले बच्चों के सीखने के बारे में सूचनाएं किस प्रकार से इकटठी कर सकते हैं?

अब यह सर्वमान्य तथ्य है कि प्रत्येक बच्चे की प्रकृति एवं सीखने की गति में भिन्नता होती है तथा वे अलग-अलग विधियों से सीखते हैं। हर विषयवस्तु को सीखने-सिखाने की विधियाें में भिन्नता होने के कारण प्रत्येक बच्चे की प्रस्तुति एवं अभिव्यकित भी पृथक एवं विशिष्ट होती है। अत: यह आवश्यक है कि बच्चों का मूल्यांकन कागज-कलम परीक्षा के अतिरिक्त अन्य विधाओं द्वारा भी किया जाये। अन्य विधाओं के प्रयोग से बच्चों की स्मृति क्षमता के स्थान पर अन्य उच्चतर क्षमताओं यथा-अभिव्यकित, विश्लेषण, समस्या का समाधान एवं अनुप्रयोग आदि दक्षताओं का विकास संभव होगा। चूंकि प्रत्येक बच्चे की प्रकृति विशिष्ट है और शिक्षण पद्धतियाँ भी भिन्न होती हैं, अत: एक समान मूल्यांकन पद्धति उपयुक्त नहीं हो सकती है।

इन तथ्यों को ध्यान में रखकर नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 में बच्चों के सीखने और उसे उपयोग करने की योग्यताओं का सतत एवं व्यापक मूल्यांकन करने का प्राविधान किया गया।      

नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 की धारा 29 की उपधारा (2) के अनुसार मूल्यांकन प्रकि्रया में निम्नलिखित बिन्दुओं का ध्यान रखा जाना आवश्यक है:-
(ख) - बच्चों का सर्वांगीण विकास हो।
(घ) - शारीरिक और मानसिक योग्यताओं का पूर्णतम मात्रा तक विकास हो।
(ज) - बच्चों के सीखने की क्षमता, ज्ञान और उसके अनुप्रयोग की क्षमता का व्यापक और सतत मूल्यांकन हो।


बच्चों के मूल्यांकन की यह सतत एवं व्यापक प्रकि्रया कोर्इ पृथक गतिविधि न होकर सीखने-सिखाने की प्रकि्रया का अभिन्न, सतत और सारगर्भित अंग होगी। बच्चे की प्रगति के लिए आवश्यक है कि मूल्यांकन की प्रकि्रया बाल केनिद्रत हो, कक्षा में पायी जाने वाली विविधता को समझने वाली हो, आवश्यकता के अनुसार लचीली हो तथा हर बच्चे की आयु, सीखने की गति, शैली और स्तर के अनुसार चलने वाली हो।

यहाँ सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का अर्थ यह कदापि नहीं है कि बच्चों की वार्षिक, अद्र्धवार्षिक और सत्र परीक्षाओं के अतिरिक्त मासिक, पाक्षिक या साप्ताहिक परीक्षाएं ली जाये। बच्चे के विकास का सतत मूल्यांकन एक सामयिक घटना (सत्र परीक्षा या वार्षिक परीक्षा) नहीं होती वरन यह शैक्षणिक सत्र की समूची अवधि में लगातार चलती है। दूसरी ओर व्यापक का आशय अकादमिक प्रगति के साथ-साथ बच्चे के  शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास की भी जानकारी प्राप्त करना है। शिक्षा का उददेश्य बच्चों में पाठयक्रमीय  दक्षताओं और कौशलों का विकास करना मात्र न होकर छात्रों का सर्वांगीण विकास करना है। मूल्यांकन में सततता के साथ-साथ व्यापकता का तत्व समाहित किये बिना बच्चों के सर्वांगीण विकास के लक्ष्य की प्रापित सम्भव नहीं है। इसके लिए आवश्यक है कि बच्चों के शारीरिक विकास, नियमित उपसिथति, खेलों तथा सांस्कृतिक गतिविधियों में सहभागिता, नेतृत्व क्षमता, सृजनात्मकता आदि व्यकितगत एवं सामाजिक गुणों के क्रमिक विकास का सतत मूल्यांकन किया जाता रहे।    

                ''सतत एवं व्यापक मूल्यांकन प्रकि्रया के द्वारा शिक्षण-अधिगम के समय ही शिक्षक को छात्रों के सीखने की प्रगति और कठिनार्इयों के बारे में निरन्तर जानकारी मिलती रहेगी। इस प्रकार की व्यवस्था में एक दीर्घ अन्तराल के बाद चलाए जाने वाले उपचारात्मक शिक्षण की आवश्यकता भी समाप्त हो जायेगी, क्योंकि छात्र की कठिनार्इ का समय रहते निदान और उपचार हो सकेगा तथा यथासमय ही कठिनाइयों का निवारण होने से छात्रों में आत्मविश्वास जाग्रत होगा, सीखने की प्रक्रिया सुगम होगी और छात्रों के मन से परीक्षा विषयक भय और तनाव भी दूर होगा। इस क्रम में शिक्षक और छात्र के बीच जो संवाद और आत्मीयता के संबंध विकसित होंगे, उनसे छात्रों की उपसिथति में तो वृद्धि होगी ही साथ ही साथ बीच में विधालय छोड़ जाने वाले ;कतवचवनजद्ध छात्रों की संख्या में भी गिरावट आयेगी।


उपयर्ुक्त चर्चा से यह स्पष्ट है कि वर्तमान विधालयी शिक्षणमूल्यांकन व्यवस्था में व्यापक व्यवस्थागत सुधारों की जरूरत है। मूल्यांकन की प्रकि्रया कक्षाओं में चल रही सीखने-सिखाने की ही एक प्रक्रिया है एवं मूल्यांकन के वही तरीके अच्छे होते हैं जो बच्चों के सीखने की गति और सीखने के तरीकों के अनुरूप होते हैं।