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Monday, 18 November 2013

संकेतक की कविता

बच्चों ने कितना सीखा, ये संकेतक बतलाते हैं,
पाठयक्रमीय लक्ष्यों को हासिल करने के नाते हैं।
अब तक मैंने इतना सीखा, जाना या फिर पहचाना,
इसकी सम्यक समझ न जिनकों, राहों में रह जाते हैं।।

बहुत जरूरी हम शिक्षक हित संकेतक का ज्ञान है,
अब प्रकरण पर नहीं प्रकि्रया पर ही देना ध्यान है।
कितनी हुयी प्रगति अब तक होती इससे पहचान है,
मेरा तो मन्तव्य यही, ये CCE की जान है।।

Composed by - बिन्देश्वरी प्रसाद,
0बी0आर0सी0-पिण्डरा,
वाराणसी।

Shared by - महमूदुल हक
00, पू0मा0वि0-मुजेहनी,
बलरामपुर।

बच्चों की प्रगति के संकेतक

यह हमारी एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि किसी भी नए प्रत्यय या शब्दावली की हम परिभाषा ढूंढ़ने की कोशिश करने लगते हैं। कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनकी कोर्इ निर्धारित परिभाषा नहीं होती है। वे अपने गुणों व विशेषताओं से पहचाने जाते हैं। जैसे, शिक्षा की परिभाषा क्या होगी? या फिर सत्य को आप कैसे परिभाषित करेंगे? ऐसे शब्दों की कोर्इ निशिचत परिभाषा नहीं होती है। इनके गुणों की वजह से ही इनकी पहचान होती है। साथ ही ये तुलनात्मक होते हैं। शिक्षा या सत्य की परिभाषा व्यक्ति विशेष पर निर्भर होती है तथा यह उनके लिए अलग-अलग हो सकती है।

संकेतक एक ऐसा ही शब्द है। आइए, हम इसकी बुनियादी समझ बनाने की कोशिश करते हैं। अब तक हम दक्षता के आधार पर बच्चों के अधिगम स्तर का निर्धारण करते रहे हैं जिसे Minimum Level of Learning कहते हैं। ये दक्षताएं एक पाठयक्रम के माध्यम से प्रदेश के समस्त विधालयों में लागू होती हैं। इस प्रकार एक समान दक्षताओं के आधार पर ही समस्त विधालयों में शिक्षक अपनी शिक्षण योजना बनाते हैं। प्रश्न यह है कि क्या यह उचित है? क्या प्रदेश के समस्त विधालयों में बच्चों के सम्प्रापित आकलन के लिए एक जैसा मानदण्ड निर्धारित करना चाहिए? या फिर इसे तय करने की जि़म्मेदारी व स्वतंत्रता विधालय व शिक्षक के ऊपर छोड़ देना चाहिए?

तमाम प्रयोगों व अध्ययन के आधार पर प्राप्त निष्कर्ष यह बताते हैं कि इस प्रकार के मानदण्ड या संकेतक का निर्माण करने की स्वतंत्रता विधालय व उसके शिक्षक के पास होनी चाहिए। शिक्षक ही वह व्यकित होता है जो अपनी विधालय व कक्षा के बच्चों की आवश्यकता व संप्रापित से बेहतर ढंग से अवगत होता है। संकेतक बच्चों की इसी प्रगति का आकलन करने में मदद करता है और शिक्षक ही इसे बेहतर ढंग से बना सकता है। अत: यह लचीली होती है। हो सकता है कि शिक्षक दो-तीन संकेतकों को मिलाकर एक संकेतक बना ले, या फिर एक संकेतक को दो या अधिक संकेतकों में विभाजित कर अपनी शिक्षण कार्ययोजना बना सकता है।

संकेतक हमें बच्चों के प्रगति के मानदण्ड प्रदान करते हैं। संकेतक हमें यह बताते हैं कि बच्चे ने अभी तक कितना ज्ञान व कौशल अर्जित किया है। साथ ही संकेतक हमें यह भी बताते हैं कि बच्चे की प्रगति की दिशा क्या है। साथ ही ये आकलन के प्रति शिक्षक व विधालय का नज़रिया प्रस्तुत करते हैं। यह नज़रिया स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार अपने मानदण्डों के निर्धारण को दर्शाता है।

पूर्व में शिक्षक का ज़ोर बच्चों के उत्तर पर रहता था, और इस क्रम में प्रक्रिया गौण हो जाती थी। यह दृषिटकोण सही नहीं था। संकेतक हमें प्रक्रिया की ओर ले जाता है। संकेतक इस बात पर ज़ोर देता है कि बच्चे ने उत्तर किस प्रकार प्राप्त किया है। प्रक्रिया बहुत ही महत्त्वपूर्ण है और संकेतक इसी ओर इंगित करता है। उदाहरण के लिए, शिक्षक ने कक्षा में हासिल का जोड़ कैसे किया जाता है, इस विषय पर शिक्षण किया। यह जांचने के लिए कि बच्चों ने यह सीखा कि नहीं, उसने एक प्रश्न (17+25) बोर्ड पर लिखा। कुछ बच्चों ने इसका उत्तर 312 लिखा। शिक्षक ने गलत उत्तर देखकर उस उत्तर को लाल रंग से काट दिया। क्या यह सही है? अगर हम बच्चे के उत्तर का विश्लेषण करें तो यह पता चलता है कि बच्चे ने एक अंक का जोड़ सही किया है। इस आधार पर उसकी वर्तमान संप्राप्ति स्तर का पता चलता है कि वह एक अंक का जोड़ कर रहा है।

संकेतक बच्चों की प्रगति का आकलन करने में मदद करती है. शिक्षक को सतत और व्यापक मूल्याङ्कन की अपनी आँख खुली रखनी चाहिए ताकि संकेतक का वह लगातार इस्तेमाल करते हुए शिक्षण अधिगम प्रक्रिया की प्रभाविता का लगातार मूल्याङ्कन करता रहे और उसमें आवश्यकता अनुसार परिवर्धन करता रहे. संकेतक इसे प्रभावी तरीके से अमल में लाने में शिक्षक की मदद करता है.



संकेतक पाठयक्रमीय लक्ष्यों पर आधारित होते हैं।

Sunday, 3 November 2013

आकलन की समझ व पारम्परिक मूल्यांकन की प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता

वर्तमान समय में प्रदेश के विधालयों में पारम्परिक मूल्यांकन की जो प्रणाली लागू है, उसके अन्तर्गत वार्षिक और अद्र्धवार्षिक परीक्षा के अतिरिक्त सत्र के मध्य में भी ली जाने वाली दो परीक्षाओं- कुल मिलाकर चार लिखित परीक्षाओं के माध्यम से मूल्यांकन का प्रावधान है। वर्तमान मूल्यांकन प्रकि्रया पूरी तरह से औपचारिक ताने-बाने में गुँथी हुअी है। निशिचत अवधि के अंतराल पर मौखिकलिखित परीक्षा के दिन तय किये जाते हैं।

आर.टी.र्इ.-2009 और एन.सी.एफ.-2005 में यह बार-बार कहा गया है कि बच्चे के अनुभव को महत्व मिलना चाहिए एवं उसकी गरिमा सुनिशिचत की जानी चाहिए, परन्तु यह तब तक पूर्णतया संभव नहीं है जब तक कि प्रचलित मूल्यांकन पद्धति में परिवर्तन न किया जाय। वर्तमान मूल्यांकन व्यवस्था में किसी समय विशेष पर लिखित परीक्षा की व्यवस्था है, जबकि छात्र का संवृद्धि एवं विकास सम्पूर्ण सत्र में विकसित होता है। इस तरह के मूल्यांकन से कुछ बच्चों को असुरक्षा, तनाव, चिंता और अपमान जैसी सिथतियों का सामना करना पड़ता है। सावधिक परीक्षाओं से यह तो पता चलता है कि बच्चे कितना जानते हैं, पर यह नहीं पता चलता कि जो नहीं जानते उनके न जानने के क्या कारण हैं। इस तरह का मूल्यांकन पाठय पुस्तकों में पढ़ार्इ गर्इ विषयवस्तु और रटंत प्रणाली द्वारा प्राप्त की गर्इ जानकारीज्ञान का मूल्यांकन करने तक ही सीमित है। 

अधिकांशत: यह बच्चों में तुलना करने जैसे भाव रखता है और अवांछनीय प्रतिस्पर्धा को जन्म देता है। वर्तमान व्यवस्था में केवल बच्चे की अकादमिक प्रगति का मूल्यांकन होता है, जबकि बच्चे के सर्वांगीण विकास में अकादमिक प्रगति के साथ-साथ उसकी अभिवृतितयों, अभिरुचियों, जीवन-कौशलों, मूल्यों तथा मनोवृतितयों में होने वाले परिवर्तनों का भी समान महत्व होता है।

इस प्रकार की सिथतियां कुछ महत्वपूर्ण सवालों की तरफ हमारा ध्यान खींचती हैं जैसे- हम किस चीज का मूल्यांकन कर रहे हैं? क्या टेस्टपरीक्षाओं के अतिरिक्त बच्चों का मूल्यांकन करने की कुछ और विधियाँ भी हो सकती हैं? क्या अंकों और ग्रेड के रूप में रिपोर्ट करना पर्याप्त है? मूल्यांकन संबंधी सूचनाएं किस तरह मदद करती हैं? हम अपने काम को कठिन बनाए बिना भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि से आये, और विशेष आवश्यकताओंं वाले बच्चों के सीखने के बारे में सूचनाएं किस प्रकार से इकटठी कर सकते हैं?

अब यह सर्वमान्य तथ्य है कि प्रत्येक बच्चे की प्रकृति एवं सीखने की गति में भिन्नता होती है तथा वे अलग-अलग विधियों से सीखते हैं। हर विषयवस्तु को सीखने-सिखाने की विधियाें में भिन्नता होने के कारण प्रत्येक बच्चे की प्रस्तुति एवं अभिव्यकित भी पृथक एवं विशिष्ट होती है। अत: यह आवश्यक है कि बच्चों का मूल्यांकन कागज-कलम परीक्षा के अतिरिक्त अन्य विधाओं द्वारा भी किया जाये। अन्य विधाओं के प्रयोग से बच्चों की स्मृति क्षमता के स्थान पर अन्य उच्चतर क्षमताओं यथा-अभिव्यकित, विश्लेषण, समस्या का समाधान एवं अनुप्रयोग आदि दक्षताओं का विकास संभव होगा। चूंकि प्रत्येक बच्चे की प्रकृति विशिष्ट है और शिक्षण पद्धतियाँ भी भिन्न होती हैं, अत: एक समान मूल्यांकन पद्धति उपयुक्त नहीं हो सकती है।

इन तथ्यों को ध्यान में रखकर नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 में बच्चों के सीखने और उसे उपयोग करने की योग्यताओं का सतत एवं व्यापक मूल्यांकन करने का प्राविधान किया गया।      

नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 की धारा 29 की उपधारा (2) के अनुसार मूल्यांकन प्रकि्रया में निम्नलिखित बिन्दुओं का ध्यान रखा जाना आवश्यक है:-
(ख) - बच्चों का सर्वांगीण विकास हो।
(घ) - शारीरिक और मानसिक योग्यताओं का पूर्णतम मात्रा तक विकास हो।
(ज) - बच्चों के सीखने की क्षमता, ज्ञान और उसके अनुप्रयोग की क्षमता का व्यापक और सतत मूल्यांकन हो।


बच्चों के मूल्यांकन की यह सतत एवं व्यापक प्रकि्रया कोर्इ पृथक गतिविधि न होकर सीखने-सिखाने की प्रकि्रया का अभिन्न, सतत और सारगर्भित अंग होगी। बच्चे की प्रगति के लिए आवश्यक है कि मूल्यांकन की प्रकि्रया बाल केनिद्रत हो, कक्षा में पायी जाने वाली विविधता को समझने वाली हो, आवश्यकता के अनुसार लचीली हो तथा हर बच्चे की आयु, सीखने की गति, शैली और स्तर के अनुसार चलने वाली हो।

यहाँ सतत एवं व्यापक मूल्यांकन का अर्थ यह कदापि नहीं है कि बच्चों की वार्षिक, अद्र्धवार्षिक और सत्र परीक्षाओं के अतिरिक्त मासिक, पाक्षिक या साप्ताहिक परीक्षाएं ली जाये। बच्चे के विकास का सतत मूल्यांकन एक सामयिक घटना (सत्र परीक्षा या वार्षिक परीक्षा) नहीं होती वरन यह शैक्षणिक सत्र की समूची अवधि में लगातार चलती है। दूसरी ओर व्यापक का आशय अकादमिक प्रगति के साथ-साथ बच्चे के  शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास की भी जानकारी प्राप्त करना है। शिक्षा का उददेश्य बच्चों में पाठयक्रमीय  दक्षताओं और कौशलों का विकास करना मात्र न होकर छात्रों का सर्वांगीण विकास करना है। मूल्यांकन में सततता के साथ-साथ व्यापकता का तत्व समाहित किये बिना बच्चों के सर्वांगीण विकास के लक्ष्य की प्रापित सम्भव नहीं है। इसके लिए आवश्यक है कि बच्चों के शारीरिक विकास, नियमित उपसिथति, खेलों तथा सांस्कृतिक गतिविधियों में सहभागिता, नेतृत्व क्षमता, सृजनात्मकता आदि व्यकितगत एवं सामाजिक गुणों के क्रमिक विकास का सतत मूल्यांकन किया जाता रहे।    

                ''सतत एवं व्यापक मूल्यांकन प्रकि्रया के द्वारा शिक्षण-अधिगम के समय ही शिक्षक को छात्रों के सीखने की प्रगति और कठिनार्इयों के बारे में निरन्तर जानकारी मिलती रहेगी। इस प्रकार की व्यवस्था में एक दीर्घ अन्तराल के बाद चलाए जाने वाले उपचारात्मक शिक्षण की आवश्यकता भी समाप्त हो जायेगी, क्योंकि छात्र की कठिनार्इ का समय रहते निदान और उपचार हो सकेगा तथा यथासमय ही कठिनाइयों का निवारण होने से छात्रों में आत्मविश्वास जाग्रत होगा, सीखने की प्रक्रिया सुगम होगी और छात्रों के मन से परीक्षा विषयक भय और तनाव भी दूर होगा। इस क्रम में शिक्षक और छात्र के बीच जो संवाद और आत्मीयता के संबंध विकसित होंगे, उनसे छात्रों की उपसिथति में तो वृद्धि होगी ही साथ ही साथ बीच में विधालय छोड़ जाने वाले ;कतवचवनजद्ध छात्रों की संख्या में भी गिरावट आयेगी।


उपयर्ुक्त चर्चा से यह स्पष्ट है कि वर्तमान विधालयी शिक्षणमूल्यांकन व्यवस्था में व्यापक व्यवस्थागत सुधारों की जरूरत है। मूल्यांकन की प्रकि्रया कक्षाओं में चल रही सीखने-सिखाने की ही एक प्रक्रिया है एवं मूल्यांकन के वही तरीके अच्छे होते हैं जो बच्चों के सीखने की गति और सीखने के तरीकों के अनुरूप होते हैं।

बच्चे, विदद्यालय व आकलन

आमतौर पर ऐसा सोचा जाता है कि बच्चे कोरी स्लेट होते हैं, जिन्हें उन सूचनाओं और ज्ञान से भरना है जो शिक्षक के ही पास हैं। किन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता है। जब बच्चे पहली बार कक्षा में प्रवेश करते हैं, तब उनके पास बहुत से अनुभव होते हैं। प्रत्येक बच्चे में सीखने की क्षमता अंतर्निहित होती है तथा अपने अनुभवों से वह अपने ज्ञान का खुद सृजन करता है। अत: बच्चे पहले से जो भी जानते और समझते हैं, उसके आधार पर ही आगे कुछ सिखाने की योजना बननी चाहिए। विधालय के अनुभव तथा बच्चे की बाहर की दुनिया के अनुभव को कल्पनापूर्ण ढ़ंग से जोड़कर हम विधालयी वातावरण के अजनबीपन को कुछ कम कर सकते हैं। स्कूल के पास बच्चे को देने के लिए नए और रुचिकर अनुभव हो सकते हैं लेकिन ऐसा कदापि प्रतीत नहीं होना चाहिए कि वे बच्चे के अनुभवों की अनदेखी कर रहा है। सीखना एक सतत प्रकि्रया है इसलिए सीखना सिर्फ विधालय में ही नहीं होता। अत: कक्षा में सीखने की प्रकि्रया को घर में जो कुछ भी हो रहा है, उससे जोड़ा जाना जरूरी है।

शिक्षण सामान्य बातचीत के माध्यम से होना चाहिए न कि एकतरफा भाषण की रीति से। यह बातचीत का ही तरीका हो सकता है, जिससे बच्चे का आत्मविश्वास और उसकी स्व-चेतना बढ़ेगी तथा वह ज्यादा सरलता से अपने तथा शिक्षक के द्वारा दिए जा रहे अनुभवों के बीच रिश्ता बनाएगा। सीखना समग्रता में ही संभव है न कि न्यूनतम अधिगम स्तर आधारित पाठयक्रम और मूल्यांकन प्रणाली में, जहाँ ज्ञान को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा या विषयों में बाँटा जाता है। इसलिए सीखने के लिए समेकित विधि ही बेहतर है।

हर बच्चे की अपनी पसंद, नापसंद, रुचियां, परिवेश, कौशल, अनुभव और व्यवहार के तरीके होते हैं। इस प्रकार हर बच्चा अपने आप में अद्वितीय है। चूंकि प्रत्येक बच्चा अपने आप में एक अद्वितीय व्यकित तथा किसी भी सिथति के प्रति अपने ही ढंग से प्रतिकि्रया करता है। इसलिए बच्चों के लिए सीखने-सिखाने की योजना बनाते समय यह बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम उनमें पार्इ जाने वाली भिन्नताओं को पहचान सकें और इस सच्चार्इ को भी स्वीकार करें कि वे सीखने के दौरान भिन्न-भिन्न तरीके से प्रतिकि्रया करते और समझते हैं। इसलिए आकलन ऐसा हो जो यह सुनिशिचत कर सके कि यह विविधता अपने पूर्ण रूप में निखरे।

आकलन केवल याद करने की क्षमता का नहीं होना चाहिए। मूल्यांकन में इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए कि उसे जो पढ़ाया गया है, उसका अपने जीवनानुभव तथा दूसरी अन्य चीजों से संबंध जोड़ने की योग्यता, सीखी गयी चीजों के बारे में नए और सटीक प्रश्न बनाने की क्षमता, अपने पाठों में सही और गलत के विचार से विचलन को देख पाने की क्षमता विकसित हो। मूल्यांकन के द्वारा विधालय उसमें इस प्रकार की क्षमताएं विकसित करने का प्रयत्न कर सकता है। तात्पर्य यह है कि सभी बच्चे दी जा रही सूचनाओं के अर्थ अपने पूर्व अनुभवों और अधिगम के आधार पर अपनी ही तरह से बना लेते हैं। यही प्रकि्रया बच्चे को अपनी समझ बनाने और निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित करती है। ज्ञान तक पहुँचने, उसे प्राप्त करने की हर बच्चे की यह प्रकि्रया लगातार चलती रहती है।

दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें !

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें !

Wednesday, 30 October 2013

कहानी सुनाने का एक नायाब तरीका

पाठ्यपुस्‍तकों में कहानियाँ होती हैं। आमतौर पर उनका उपयोग कक्षा में बहुत सीमित स्‍तर पर होता है। लेकिन यह निर्विवाद रूप से सत्‍य है कि अगर शिक्षक चाहे तो वह किसी भी एक कहानी के माध्‍यम से बच्‍चों के बीच सोचने के बहुत सारे आयाम खोल सकता है। लेकिन कहानी प्रस्‍तुत किस तरह की जाए, यह भी एक सोचने की बात है। कुछ शिक्षक इसके लिए नए तरीके खोजते रहते हैं।

अज़ीम प्रेमजी स्‍कूल, दिनेशपुर, उधमसिंह नगर के शिक्षक साहबुद्दीन अंसारी ने  अपना ऐसा ही एक अनुभव इस वीडियो में साझा किया  ह।




Monday, 28 October 2013

Continuous and Comprehensive Evaluation

Continuous evaluation
Modern educational theory has battled with such obsolete practices of examinations for a long time. Its message is simple and clear: namely that children’s learning and development cannot be viewed in terms of a rigidly defined class structure, nor it can be fitted into an annual cycle of evaluation and promotion. The RTE Act represents the legal approval of modern educational thinking when the Act prohibits detention and requires that a child can join the school at any point in the year. The vision underlying the RTE Act is further clarified by the prohibition imposed on Board examination at the end of the elementary stage or before it. This vision is completely consistent with NCF which also recommends that there should be no Board examination at any point in elementary education.

‘Continuous Evaluation’ means that the  teacher’s work should be continuously guided by the child’s response and participation in classroom activities. In other words, evaluation should be seen as a process whereby the teacher learns about the child in order to be able to teach better, and ‘Continuous Evaluation’ becomes a strategy of assessment which is a part and parcel of teaching itself.

Comprehensive evaluation
The term ‘Comprehensive’ implies the capacity to view the child from a holistic perspective, rather than merely in terms of  a learner of different school subjects. A comprehensive evaluation strategy would imply that aspects such as the child’s health, self-image, sensibilities, etc. are also perceived in the context of development and growth. Conventionally these aspects are either neglected in our education system or as we now see in private schools, dealt with by using an arbitrarily devised grading system which conveys the impression that the teacher has judged the child according to a norm. It is the duty of the teacher to make every possible effort, through interaction and engagement, to observe and understand the child’s own nature. It is also important that the teacher does not judge the child’s nature. Rather, what is required is that the teacher notices the inherent potential of the child as a learner in the context of his or her nature. Training for careful observation and record-keeping will have to be organised and executed in a careful and academically sound manner, to enable teachers to fulfill the expectation of the RTE Act. For guiding teachers to observe a child’s behaviour and attitudes, a new initiative will have to be taken for developing relevant material which can serve as a basis for training programmes.

Report  of the Committee on Implementation of RTE and Consequent Revamp of SSA